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बिहार में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मी, जीतन राम मांझी ने पुराने वादे की याद दिलाई

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बिहार में राज्यसभा की पांच सीटों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। देशभर में 37 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिनमें बिहार की ये पांच सीटें विशेष रूप से अहम मानी जा रही हैं। इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच सीटों के गणित और सहयोगी दलों की दावेदारी ने मुकाबला रोचक और जटिल बना दिया है। बिहार की ये पांच सीटें एनडीए के तीन और महागठबंधन के दो सांसदों के कार्यकाल पूरा होने के कारण खाली हो रही हैं। विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों के अनुसार, एनडीए के पास 202 विधायक हैं। एक सीट जीतने के लिए कम से कम 41 वोटों की आवश्यकता है। पांचों सीटें जीतने के लिए एनडीए को कुल 205 विधायकों का समर्थन चाहिए। वहीं, महागठबंधन के पास 35 विधायक हैं। यदि AIMIM के 5 और बहुजन समाज पार्टी के 1 विधायक का समर्थन मिल जाता है, तो विपक्ष कम से कम एक सीट जीतने में सक्षम हो सकता है। तेजस्वी यादव की पार्टी इस दिशा में सक्रिय मानी जा रही है, हालांकि AIMIM ने भी अपनी शर्तें रखी हैं। एनडीए के भीतर चर्चा है कि दो सीट भाजपा, दो सीट जदयू और एक सीट सहयोगी दल को दी जाए। सहयोगी दलों में राज्यसभा की सीट को लेकर मंथन जारी है। उपेंद्र कुशवाहा पहले से ही दावेदार माने जा रहे हैं। इसके अलावा एलजेपी (आरवी) और हम भी अपनी दावेदारी जता रहे हैं। इस बीच, केंद्रीय एमएसएमई मंत्री और पार्टी अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने एक सीट को लेकर एनडीए नेतृत्व को पुराने वादे की याद दिलाई। उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गठबंधन के घटक के रूप में उन्हें दो लोकसभा और एक राज्यसभा सीट देने का आश्वासन दिया गया था। मांझी ने कहा कि वे अंतिम निर्णय तक प्रतीक्षा करेंगे और विश्वास है कि नेतृत्व अपने वादे से पीछे नहीं हटेगा। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी ओर से अभी कोई औपचारिक मांग नहीं की गई है। इस बीच, चिराग पासवान ने उन अटकलों को खारिज कर दिया है, जिनमें उनकी मां रीना पासवान को राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा थी। बिहार से जिन नेताओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, उनमें रामनाथ ठाकुर, हरिवंश नारायण सिंह, उपेंद्र कुशवाहा, प्रेमचंद्र गुप्ता और अमरेंद्रधारी सिंह शामिल हैं। इन पांच सीटों पर सियासी गणित और सहयोगी दलों की भूमिका इस बार निर्णायक साबित होगी। इसी बीच जीतन राम मांझी ने राज्य की शराबबंदी नीति पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि कानून सही है, लेकिन इसका क्रियान्वयन प्रभावी नहीं है। उनके अनुसार अमीर महंगी शराब का सेवन कर रहे हैं, जबकि गरीब सस्ती और जहरीली शराब के शिकार हो रहे हैं। मांझी ने दावा किया कि कानूनी कार्रवाई में भी गरीब ही अधिक फंसते हैं, जबकि तस्कर अवैध कारोबार से लाभ कमाते हैं। उन्होंने शराबबंदी कानून की समीक्षा की आवश्यकता जताई। इस खबर से स्पष्ट है कि बिहार में राजनीतिक और सियासी गणित दोनों ही गतिशील हैं, राज्यसभा चुनाव के साथ-साथ सहयोगी दलों और गठबंधन नेताओं के बीच सीटों को लेकर मंथन तेज हो गया है। वहीं, सामाजिक मुद्दों जैसे शराबबंदी पर नेताओं की टिप्पणियां भी सुर्खियों में बनी हुई हैं, जो चुनावी माहौल को और जटिल बना रही हैं।

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